उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले से बेसिक शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। नए शैक्षिक सत्र की शुरुआत के बावजूद जिले के 15 परिषदीय बेसिक स्कूलों में एक भी नया दाखिला दर्ज नहीं हुआ है। शिक्षा विभाग ने इसे गंभीर मानते हुए संबंधित प्रधानाध्यापकों और इंचार्ज शिक्षकों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। इस घटना ने सरकारी स्कूलों में घटते नामांकन और शिक्षा व्यवस्था की चुनौतियों को फिर से चर्चा में ला दिया है।
बेसिक स्कूलों में शून्य नामांकन से बढ़ी चिंता
जिले के कई सरकारी प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में नए छात्रों का प्रवेश नहीं होना विभाग के लिए चिंता का विषय बन गया है। बेसिक शिक्षा विभाग के पोर्टल पर जब इन स्कूलों का नामांकन शून्य दिखा, तो अधिकारियों ने तुरंत इसकी समीक्षा शुरू कर दी। विभाग का कहना है कि लगातार नामांकन अभियान चलाने और स्कूल चलो अभियान के निर्देश देने के बावजूद यदि किसी विद्यालय में एक भी छात्र का प्रवेश नहीं हो रहा है, तो यह स्थिति गंभीर मानी जाएगी।
सरकारी स्कूलों में छात्रों की संख्या कम होने के पीछे कई कारण सामने आते रहे हैं। इनमें निजी स्कूलों की बढ़ती संख्या, अभिभावकों का रुझान, शिक्षण गुणवत्ता को लेकर धारणा और ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता की कमी प्रमुख मानी जाती है। हालांकि शिक्षा विभाग अब इस पूरे मामले की गहन जांच कर रहा है।
बीएसए ने प्रधानाध्यापकों से मांगा स्पष्टीकरण
जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी कोमल चौधरी ने संबंधित विद्यालयों के प्रधानाध्यापकों और इंचार्ज शिक्षकों को नोटिस जारी कर यह स्पष्ट करने को कहा है कि आखिर स्कूलों में दाखिला क्यों नहीं हुआ। साथ ही यह भी पूछा गया है कि छात्रों को जोड़ने के लिए अब तक कौन-कौन से प्रयास किए गए।
विभाग ने शिक्षकों को निर्देश दिए हैं कि वे तुरंत गांवों और आसपास के क्षेत्रों में संपर्क अभियान चलाएं और अभिभावकों को सरकारी स्कूलों की सुविधाओं के बारे में जानकारी दें। यदि अगली समीक्षा तक स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो संबंधित अधिकारियों और शिक्षकों पर कार्रवाई की जा सकती है।
पोर्टल अपडेट में देरी भी हो सकती है कारण
कुछ अधिकारियों का मानना है कि कई बार स्कूलों में प्रवेश प्रक्रिया पूरी हो जाती है लेकिन उसका डेटा समय पर पोर्टल पर अपडेट नहीं हो पाता। इससे वास्तविक आंकड़ों और ऑनलाइन रिकॉर्ड में अंतर देखने को मिलता है। हालांकि विभाग ने साफ किया है कि तकनीकी कारणों के बावजूद नामांकन बढ़ाने की जिम्मेदारी संबंधित स्कूल प्रशासन की ही होगी।
शिक्षा विभाग अब नियमित निगरानी कर रहा है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सभी सरकारी विद्यालयों में समय पर प्रवेश प्रक्रिया पूरी हो और बच्चों को शिक्षा से जोड़ा जा सके।
सरकारी स्कूलों में नामांकन घटने की बड़ी वजहें
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी स्कूलों में घटते नामांकन के पीछे कई सामाजिक और प्रशासनिक कारण हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में कई अभिभावक अब निजी स्कूलों की ओर आकर्षित हो रहे हैं। इसके अलावा कुछ स्कूलों में शिक्षकों की कमी, आधारभूत सुविधाओं की स्थिति और शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर सवाल भी उठते रहे हैं।
हालांकि सरकार द्वारा मिड-डे मील, मुफ्त यूनिफॉर्म, किताबें और छात्रवृत्ति जैसी योजनाएं चलाई जा रही हैं, लेकिन कई क्षेत्रों में इन योजनाओं की जानकारी लोगों तक सही तरीके से नहीं पहुंच पाती। ऐसे में शिक्षा विभाग के लिए यह चुनौती और भी बड़ी हो जाती है कि वह सरकारी स्कूलों में लोगों का विश्वास मजबूत करे।
स्कूल चलो अभियान पर रहेगा फोकस
उत्तर प्रदेश सरकार हर साल “स्कूल चलो अभियान” के माध्यम से बच्चों को स्कूलों से जोड़ने की कोशिश करती है। इस अभियान का उद्देश्य ड्रॉपआउट बच्चों को वापस स्कूल लाना और नए बच्चों का नामांकन सुनिश्चित करना होता है। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि जिन स्कूलों में अभी तक दाखिला नहीं हुआ है, वहां विशेष अभियान चलाया जाएगा।
इसके तहत शिक्षकों को घर-घर जाकर अभिभावकों से संपर्क करने, गांव स्तर पर जागरूकता कार्यक्रम चलाने और बच्चों को स्कूल आने के लिए प्रेरित करने के निर्देश दिए गए हैं। आने वाले दिनों में विभाग इस अभियान की प्रगति की लगातार समीक्षा करेगा।
शिक्षा व्यवस्था पर उठ रहे सवाल
15 स्कूलों में शून्य नामांकन का मामला सामने आने के बाद शिक्षा व्यवस्था को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते इस स्थिति में सुधार नहीं किया गया तो ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों की स्थिति और कमजोर हो सकती है।
शिक्षा विभाग के लिए यह जरूरी हो गया है कि वह केवल नामांकन बढ़ाने तक सीमित न रहे, बल्कि स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बेहतर वातावरण भी सुनिश्चित करे। तभी अभिभावकों का भरोसा सरकारी विद्यालयों की ओर वापस लौट सकेगा।